खेती समझौते के अधीन विकासशील देशों के लिए विशेष और विभेदक उपचार
Ø विशेष विभेदक (भेदन करनेवाला,मतभेद करनेवाला) सिद्धांत (s&d) यह है की अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का कुछ विशेष आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विकास होना चाहिए डब्ल्यूटीओ और विशेष एवं विभेदक उपचार के मुख्य दो रूप हैं प्रथम, बाजार पहुंच की संभावना जिस में विकासशील देशों की वस्तुओं को विकसित देशों के बाजार में पहुंचने के लिए वरीयता(सर्वश्रेष्ठता) ही विशेष विभेदक उपचार की मुख्य विशेषता है (2) व्यापार नियमों सिद्धांतों में विशेष प्रतिबद्धताओं के अलावा विकासशील देशों को इन बहुपक्षीय समझौते के कार्यान्वयन हेतु छूट दी जा सकती है
Ø उरुग्वे वार्ता में विशेष एवं विभेदक सिद्धांत यही भी प्रावधान कराता है कि बहुपक्षीय समझौते के तहत विकासशील देशों को इन नीतियों के सतत कार्यान्वयन हेतु हर संभव तकनीकी सहायता प्रदान की जाए खेती पर wto समझौता यह प्रावधान का आता है कि विकासशील देशों को विशेष एवं विभेदक सिद्धांत के तहत अनेक रास्ते हैं, जैसे वह वर्तमान सीमा शुल्क में सुरक्षा और स्वयं निर्धारित सीमा के अधीन अपने प्रशुल्क स्तर को निर्धारित कर सके इन्हें अपने प्रशुल्क मैं कटौती हेतु लंबी समय सीमा दी गई जैसे कार्यान्वयन हेतु लचीलापन का प्रावधान किया गया है
Ø परंतु कुछ विकासशील देश खेती संधि में दिए गए लचीलापन को प्राप्त नहीं मानते हैं उनका तर्क है कि उन्हें इस बात का पूर्ण अधिकार होना चाहिए कि वह खाद्यान्न सुरक्षा हेतु घरेलू खाद्यान्न उत्पादन का समर्थन एवं संरक्षण, जीवन यापन सुरक्षा तथा ग्रामीण विकास के अन्य कारकों के साथ ही उत्पादकों उपभोक्ता को वैश्विक मूल्य तथा आयत परवाह से संरक्षण दे सकें उनका यह भी कहना है कि वर्तमान संधि असमान है अनुशासन संबंधी नियम विकासशील देशों पर कठोरता से लागू किए जाते हैं
Ø जबकि विकसित देश के प्रति उनका रवैया नरम होता है उदाहरण कुछ विकासशील देशों द्वारा अपने किसानो को घरेलू सब्सिडी देने के कारण इन संधि के अधीन व्यापार के समर्थन में भविष्य में किए जाने वाले व्यापार को सीमित कर दिया गया है जबकि दूसरी तरफ विकसित देशों को इस समझौते के अधीन अपने किसानो को व्यापार के समर्थन में अत्यंत कम स्तर पर लगाया गया है जबकि उद्देश्य यह था कि विकासशील देशों के मुकाबले विकसित देशों द्वारा अधिक मात्रा में प्रशुल्को में कटौती की जाएगी( अल्प विकसित देशों द्वारा किसी प्रकार की कटौती नहीं की जाएगी)
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में उद्योग एवं सेवाएं
हाल के कुछ वर्षों में तकनीक के क्षेत्र में विशेषकर संचार एवं परिवहन के क्षेत्र में हुई थी वृद्धि के कारण पूरे विश्व में वैश्वीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है वैश्वीकरण का उद्योगों पर कई लाभकारी परिणाम हुआ है जिससे उद्योग में व्यापार प्रक्रिया का आउटसोर्सिंग मुख्य बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग पेट्रोलियम तथा विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश हुआ है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने के कारण अर्थव्यवस्था में गति भी दूर हो जाती है
वैश्वीकरण का एक लाभ यह भी है कि कई विदेशी कंपनियां घरेलू अर्थव्यवस्था में उद्योग की स्थापना करती है जो देश के लोगों को रोजगार प्रदान करने में भी सहायता प्रदान करता है इससे देश में गरीबी तथा बेरोजगारी के स्तर में भी कमी आती है उद्योग में वैश्वीकरण का एक और लाभ यह है कि विदेशी कंपनियां अपने साथ अत्यंत उच्च तकनीक को लाती है जो घरेलू उद्योगों को तकनीक को और अधिक उन्नत बनाने में मदद करता है
सेवाएं एक ऐसी आर्थिक प्रक्रिया है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी अन्य आर्थिक इकाई अथवा अन्य आर्थिक इकाई से संबंधित उत्पादों के मूल्य में वृद्धि करती है सेवाएं को एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संस्थान द्वारा सेवा दिए जाने से पहले उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच प्रत्येक संबंध बन जाता है यह स्थापत्य से लेकर वॉइस मेल तक दूरसंचार से लेकर हवाई परिवहन तक सेवाएं विकसित और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में अत्यंत गतिशील इकाई के रूप में उपलब्ध कराता है सेवाएं अधिकांश वस्तुओं के उत्पादन के लागत के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है उरुग्वे की व्यापार वार्ता के दौरान इसे शामिल किए जाने के फल स्वरुप सेवा व्यापार में समझौता संभव हुआ जनवरी 2000 से यह है विपक्ष या व्यापार वार्ता का विषय बन गया है
वर्तमान में कुछ कुल वैश्विक उत्पादन का 60% से अधिक भाग सेवाओं से आता है जबकि यह कुल व्यापार से उत्पन्न रोजगार का 20% भाग ही रखता है कई सेवाएं जो लंबे समय तक विशुद्ध रूप से घरेलू क्रियाकलाप मानी जाती थी अब तीव्र गति से अंतरराष्ट्रीय संचरण (फैलना)की सेवाएं हो गई हैं
आउटसोर्सिंग/ वित्तीय वैश्वीकरण/ पूंजी नियंत्रण
आउटसोर्सिंग तथा श्रमिकों का प्रवसन( प्रवास)
- बाहरी स्रोत को ठेके पर देना
- बाहरी स्रोत से माल मंगाना
- बाहरी स्रोत से सेवाएँ प्राप्त करना
यह भूमंडलीकरण की चमत्कारी घटना का एक उत्पाद है एक उत्पाद है जो 1990 के दशक से दुनिया पर छाई हुई है भूमंडलीकरण का तुरंत और अति महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश के लिए खुल गई फल स्वरूप कई देशों की अर्थव्यवस्था है किसी न किसी मामले में एक दूसरे पर निर्भर हो गई महाद्वीपो के बीच कुछ क्षणों में संबंध एवं संपर्क स्थापित होने लगा इन दोनों घटनाओं से आउटसोर्सिंग की घटना शुरू हुई
आउटसोर्सिंग का इतिहास क्या रहा है
आउटसोर्सिंग के प्रारंभिक दिनों में यह धीरे-धीरे तीसरी दुनिया के अंग्रेजी के जानकारों से कार्यालय का कामकाज निपटाने से शुरू हुआ जैसे जैसे कंप्यूटर युग में प्रवेश करती गई तथा सूचना प्रौद्योगिकी नई दुनिया का शब्द बन गई तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आवश्यक हो गया कि वह अपनी सेवा में ऐसे सूचना प्रयोग योगिक विशेषज्ञों को शामिल करें आउटसोर्सिंग का सीधा परिणाम यह देखने में आया कि विकसित देशों में ऐसे रोजगार एकदम कम हो गए जिससे राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में चिंता होने लगी यह एक सार्वजनिक विवाद का विषय बन गया दरअसल अर्थशास्त्रियों को इसकी आशंका पहले से ही थी लेकिन अब भारी संख्या में लोग इसका शिकार होने लगे तो पर्सन यहां उठा की आउटसोर्सिंग का भविष्य क्या है
अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक बेनिफिट ट्रांसफर कार्यक्रम के तहत विभिन्न सेवाएं देने वाली जेपी मॉर्गन भेजने भारत जाने वाली अपनी सभी कॉल्स पर रोक लगाने का निर्णय लिया है कंपनी के इस फैसले से भारतीय कॉल सेंटर में काम कर रहे हजारों कर्मियों पर तलवार लटक गई है जेपी मॉर्गन चेज के भारत और अमेरिका में दो दो कॉल सेंटर काम कर रहे हैं कंपनी भारत जाने वाली कॉल्स को अमेरिकी सेंटर से ट्रांसफर करेगी
बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां तीव्र गति से अपनी सेवा विकासशील देशों की ओर कर रही है 1970 और 1980 के दौरान विनिर्माण संपूर्ण विश्व में फैलने के बाद वर्तमान में सेवा कंपनी तथा विनिर्माण उद्योगों के सेवा संबंधी क्रियाकलाप भी वैश्विक हुए हैं यह विकासशील देशों की अबस्थितियों में बेहतर संचार सुविधाओं तकनीकी तथा समान प्रक्रिया, सूचना तकनीकी विकास का उद्यमों द्वारा संभव हो सका है किसी भी कार्य को आउटसोर्सिंग द्वारा या स्वयं अपने कार्यालय में करने का निर्णय मुख्य रूप से निम्न उत्पादन लागत, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रयोग, व्यवसाय को प्रतिस्पर्धी बनाने के दृष्टिकोण से अथवा श्रम, पूंजी, सूचना तकनीक तथा भूमि संसाधन के और अधिक प्रयोग के आधार पर लिया जाता है आउटसोर्सिंग किए जाने वाले व्यवसाय में मुखिया सूचना तकनीकी, मानव संसाधन, सुविधाओं, का प्रबंधन तथा लेखांकन आदि आते हैं आउटसोर्सिंग कई प्रकार के होते हैं 1 अपतटीयकरण जिसमें क्रेता संगठन किसी अन्य देश का होता है आउटसोर्सिंग के अर्थ में महत्वपूर्ण टेक्निक अंतर होने के बावजूद आम बातचीत में इसे समानार्थी रूप में प्रयोग किया जाता है आउटसोर्सिंग प्रदाता के साथ एक वार्ता को शामिल करता है बढ़ते वैश्वीकरण में कंपनियों के आउटसोर्सिंग में वृद्धि के कारण आने वाले समय में आउटसोर्सिंग तथा ऑफशोरिंग के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा अमेरिका तथा ब्रिटेन में भारतीय आउटसोर्सिंग कंपनियों की स्थिति बढ़ती जा रही है
मल्टी सोर्सिंग एक ऐसा ढांचा है जिसमें ग्राहकों के व्यवसाय के विभिन्न भागों के कार्य अलग-अलग प्रदाताओं को दी जाती है तृतीय राजनीतिक आउटसोर्सिंग है जिसके अधीन कोई कंपनी बाजार मैं उपलब्ध कराए जा रही अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए किसी दूसरे फार्म से संबंधित हो जाता है इस प्रकार का समझौता ना केवल सप्लाई चैन का फार्म के उत्पादन मूल्य को बढ़ाता है बल्कि यह अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचाता है
सामान्य प्रवासी श्रमिक कार्ड की खोज में घूमने वाले गतिशील लोग होते हैं जो वैश्वीकरण से संबंधित एक प्रवृत्ति है कंप्यूटर तकनीकी, उपग्रह दूरसंचार और संरचना, इटरनेट विकास तथा सप्तम परिवहन नेटवर्क कम श्रम लागत, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए पहले के मुकाबले अत्यंत ही सुलभ हो गए हैं इंटरनेट के कारण देश के कार्य में विश्व के विभिन्न भागों में सुनिश्चित किया है यह पहले के कम लागत क्षेत्र में उत्पादन से बढ़कर आउटसोर्सिंग और ऑफशोरिंग तक आ गया है 1960 -70 के दशक के दौरान बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवासन विनिर्माण उत्पादन में श्रम लागत में प्रमुख कटौती हेतु कम श्रम लागत वाले क्षेत्र की ओर बढ़ा है
वित्तीय वैश्वीकरण
वित्तीय वैश्वीकरण एक देश के वित्तीय व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार और संस्थानों के साथ एकीकरण है यह एकीकरण सरकारों द्वारा घरेलू वित्तीय क्षेत्रों तथा पूंजी खातों को उदार बनाए जाने की आवश्यकता रखता है यह एकीकरण तब होता है जब अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में पूंजी प्रवाह के साथ-साथ उस देश के लेनदार - देनदार के द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजार तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मध्यवर्ती कार्य में भाग लिया जाता है अभी इस वित्तीय वैश्वीकरण की प्रक्रिया में विकसित देश अधिक सक्रियता से भाग ले रहे हैं वहीं विकासशील देशों ने भी अधिक सक्रियता से भाग लेना शुरू कर दिया है
वित्तीय वैश्वीकरण तथा वित्तीय एकीकरण दो अलग अलग संकल्पना है जहां वित्तीय वैश्वीकरण विद के सीमा पाल परिवार के साथ साथ इस के बढ़ते वैश्विक जुड़ाव को सहित करता है वही वित्तीय एकीकरण किसी देश के अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार से जुड़ाव को बताता है वित्तीय वैश्वीकरण में पिछले 30 वर्षों में कई परिवर्तन का अनुभव किया है तकनीकी प्रगति, घरेलू विद्युत क्षेत्रों तथा पूंजी खाते के वैश्वीकरण ने नए विकास को आगे बढ़ाया है वित्तीय वैश्वीकरण को बढ़ावा देने वाले मुख्य कारकों में सरकारे, निजी निवेशक तथा लेनदार वित्तीय संस्था प्रमुख है वित्तीय वैश्वीकरण का वर्तमान प्रवाह, जो कि 1980 के दशक से देखा जा रहा है जो कि औद्योगिक देशों के बीच पूंजी प्रवाह में तीव्रता तथा विशेष रूप से औद्योगिक एवं विकासशील देशों में देखा जा रहा है वित्तीय वैश्वीकरण को कुछ विकसित और विकासशील देशों में पूंजी प्रवाह दर से जोड़ा जाता है
वित्तीय वैश्वीकरण कई माध्यम से विकासशील देशों के लिए वृद्धि दर बढ़ाने में सहायक है इनमें से आर्थिक वृद्धि को निर्धारित करने वाले कुछ महत्वपूर्ण कार्य को द्वारा जिस में घरेलू बचत में वृद्धि, पूंजी के मूल्य में कमी, विकसित देशों से विकासशील देशों को तकनीक का हस्तांतरण तथा घरेलू वित्तीय क्षेत्रों का विकास सीधे तौर पर शामिल है अप्रत्यक्ष माध्यमों, जो कभी कभी प्रत्यक्ष माध्यम से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं वित्तीय वैश्वीकरण विकासशील देशों को बेहतर उपभोग प्रबंधन में भी मदद करता है
आर्थिक वैश्वीकरण के लाभ में विकासशील देशों के संवृद्धि को बढ़ाने के अलावा उसकी आर्थिक विशेष तौर पर अस्थिरता से संबंधित उपभोग अस्थिरता मैं कमी करने में तथा उसके बेहतर प्रबंधन के रूप में है व्यवहारिक तथ्य यह बताते हैं कि जिन क्षेत्रों ने प्रारंभिक अवस्था में ही आर्थिक एकीकरण किया है उनमें निर्गत तथा उपभोग दोनों स्तरों पर अस्थिरता जोखिम होता है
पूंजी नियंत्रण
यह नियंत्रण पूंजी के अंतर और बाहिया प्रभाव दोनों पर लागू होते हैं पूंजी नियंत्रण निवेश एवं साख विनियमन, व्यापार प्रतिबंध, विदेशी मुद्रा विनियमन तथा मात्रात्मक एवं कर नीति के रूप में हो सकते हैं पूंजी नियंत्रण को स्वीकार करने का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था को पूंजी के अस्थिर संचालन से बचाने, घरेलू पूर्ण रोजगार को बढ़ाने तथा सामाजिक कल्याण को अधिकतम करने तथा विदेशी मुद्रा को बचाने और घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वित्त को राष्ट्रीय नियंत्रण में रखना है इसके अलावा पूंजी नियंत्रण के पीछे वृद्धि अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सुधार तथा खतरे से निपटने के लिए समय की चाहत भी है
पूंजी नियंत्रण के दो महत्वपूर्ण रूप हो सकते हैं लेन- देन पर प्रशासनिक नियंत्रण तथा कर संबंध नियंत्रण अधिकांश प्रशासनिक नियंत्रण को अफसरशाही के द्वारा लागू किया जाता है इसलिए इन्हें लागू कर दें और हटाने दोनों में समय की आवश्यकता होती है कर से संबंधी उपाय अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन- देन की लागत को बढ़ाते हैं जबकि उन्हें प्रतिबंधों से मुक्ति मिल जाती है इस तरह का महत्वपूर्ण उपाय सीमा शुल्क एवं उत्पाद शुल्क है जो छोटे समय विधि वाले भारी निवेश के लेन- देश के प्रत्येक स्तर पर लगाए जाते हैं इस प्रकार के उपायों में नकारात्मक ब्याज दर, विदेशी बैंकों के लिए विशेष जमा आवश्यकताएं तथा बैंकों के कुल विदेशी मुद्रा जमा अथवा उनकी विदेशी लेनदार के संबंध में विशेष जमा आवश्यकताएं हैं
पूंजी नियंत्रण सरकारों के लिए तब लाभकारी होते हैं, जब वे ब्याज दरों तथा नाम मात्र के व्यापार विनिमय दरों को हटा लेते हैं ऐसा इसलिए है क्योंकि केंद्रीय बैंक स्वतंत्र रूप से नाम मात्र विनिमय दरों तथा घरेलू ब्याज दरों को निर्धारित नहीं कर सकते हैं
जो अंतरराष्ट्रीय प्रवाह पर करो के पक्षधर हैं,उनका तर्क है कि इससे उनके राजस्व में वृद्धि, विनिमय दरों की राजस्व मैं कमी तथा नीति निर्माताओं की स्वतंत्रता में वृद्धि एवं विनिमय दर व्यवस्था की रक्षा कर सकते हैं WTO के आगमन के वर्षों में पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण अपेक्षाकृत बड़ा है क्योंकि वैश्वीकरण ने पूंजी के प्रवाह को मजबूती से बढ़ाया है अन्य शब्दों में कुछ मुद्राओं की उपयोगिता उनके भौगोलिक सीमा के पार कर गई है
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