UNIT - 04 बालक :मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक संतुलित विकास || बाल विकास की अवस्था : चुनौतियां एवं समस्याएं
Unit-4 बालक :मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक संतुलित विकास
बाल
विकास की
अवस्था : चुनौतियां एवं
समस्याएं
मानसिक स्वास्थ्य - मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की विभिन्न इच्छाओं, आवश्यकता आदि के बीच एक ऐसा ताल में लगता है जिससे वह जीवन के सभी क्षेत्रों में एक संतोषजनक व्यवहार करने में समर्थ हो सकता है इस चीज को परिभाषित करते हुए स्ट्रेंज ने कहा की मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसे सीखे गए व्यवहार के बीच वर्णन के अलावा कुछ नहीं है जो सामाजिक रूप में समायोजित(Well
Adjust) होता है मानसिक स्वास्थ्य खुशी तथा प्रभावशीलता के साथ वातावरण एवं उसका दूसरे व्यक्तियों के साथ मानव का समायोजन है मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जो मानसिक रोगों के साथ साथ पूर्व अवधारणा, पक्षपातो, अंधविश्वास, इत्यादि से भी मुक्त हो मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि वह विभिन्न परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने में सक्षम हो मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति तनाव, चिंता, अवसाद आदि से भी मुक्त होता है मानसिक स्वास्थ्य मानव के अपने व्यवहार में संतुलन को दर्शाता है *
मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक
1. घरेलू वातावरण -
2. विद्यालय का प्रभाव -
3. सामाजिक विकास -
मानसिक स्वास्थ्य तथा शिक्षा
आरंभिक शिक्षा व्यवस्था में बच्चे की बुद्धि, रुचि वह मानसिक स्थिति की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था तथा शिक्षा पूरी तरह अध्यापक के ऊपर केंद्रित थी परंतु वर्तमान में जब शिक्षा का केंद्रीय तत्व बालक को माना जाने लगा तो उसकी अन्य योग्यताओं को मानकर ही पाठ्यक्रम शिक्षण विधि का निर्माण किया जाता है वर्तमान शिक्षा पद्धति में बालक का विकास ही एकमात्र लक्ष्य है तथा मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है मानव संबंध, आशिक कुशलता तथा नागरिक उत्तरदायित्व जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति तब ही संभव है जब बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ हो शिक्षा का उद्देश्य छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य ठीक बनाए रखना भी है क्योंकि डर, निराशा, चिंता और अन्य दोस्त की उपस्थिति में बच्चे की योग्यताओं का उचित विकास संभव नहीं हो सकता है शिक्षक अपने शिक्षण के कार्य की गंभीरता को समझते हुए बच्चों को उचित मार्गदर्शन तथा परामर्श देकर उनके जीवन में आने वाली कठिनाइयों से उन्हें निकालने का मार्ग दिखा सकते हैं बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालय, तथा विश्वविद्यालयों में विभिन्न वैज्ञानिक से सहायता ले कर परामर्श केंद्र चलाया जा रहे हैं
बाल विकास : एक अवधारणात्मक समझ
रेबर के अनुसार -
किसी प्राणी के संपूर्ण जीवन में होने वाले परिवर्तन को विकास कहते हैं यानी कि विकास का अर्थ जन्म से लेकर मृत्यु तक है विकास की अवस्था को चार भागों में बांटा गया है शारीरिक विकास, मानसिक विकास, सामाजिक विकास, नैतिक विकास आदि
वृद्धि या वर्धन यह दोनों अलग अलग संप्रत्यय(concept)है वर्धन का अर्थ शारीरिक विकास से होता है यानी कि व्यक्ति के शरीर के आकार, लंबाई तथा वजन में होने वाले परिवर्तन को वर्धन(वृद्धि) कहते हैं वृद्धि की अपेक्षा विकास अधिक मजबूत है विधि से शरीर के किसी विशेष पक्ष या पक्षों में परिवर्तन का बोध होता है जबकि विकास से संपूर्ण प्राणी में होने वाले परिवर्तन का संज्ञान होता है वैद्य तथा विकास करता हुआ एक बालक अपने कर्म में विभिन्न प्रकार की शारीरिक मानसिक सांस्कृतिक शैक्षिक समस्या से लगातार जुलता है
मानसिक विकास की समस्या एवं चुनौतियां
बालक के मानसिक विकास को आमतौर पर दो भागों में परिभाषित किया जाता है 1. व्यापक अर्थ मैं बालक के मानसिक विकास से मतलब समय बीतने के साथ संज्ञानात्मक विकास में होने वाले सभी परिवर्तनों से हैं रेबर के अनुसार मानसिक विकास से अभिप्राय संज्ञानात्मक विकास के उन सभी परिवर्तनों से हैं जो समय बीतने के साथ व्यक्ति में घटित होते हैं दूसरे संदर्भ में जेम्स का मानना है कि मानसिक विकास से तात्पर्य व्यक्ति के जन्म से बुढ़ापे तक की प्रगति में मानसिक योग्यता एवं कार्यों के संगठन से हैं मानसिक विकास की प्रक्रिया जन्म से शुरू होकर बुढ़ापे तक समाप्त हो जाती हैं जबकि संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया जन्म से शुरू होकर जीवन के अंतिम क्षण तक रहती है
मानसिक विकास
की विशेषताएं
इन दो भागों में बांटा गया है 1. सामान्य तथा 2. विशिष्ट
1.सामान्य विशेषताएं - यह ऐसी विशेषता है जो लगभग सभी अवस्था में देखी जाती है इसलिए इन्हें सामान्य विशेषता की संज्ञा दी जाती है जैसे कि
1. नए विचारों का विकास - बच्चे ने नए विचारों को अर्जित करते हैं विचारों का स्वरूप पहला तथा संख्या को निर्धारित करने में समाजीकरण का हाथ होता है
2. समय बीतने के साथ परिवर्तन - मानसिक विकास में समय बीतने के साथ ही नाना प्रकार के परिवर्तन होते हैं जैसे आयु बढ़ने के साथ-साथ बच्चों की मानसिक योग्यता में वृद्धि होती है
3. बढ़ती उम्र के साथ परिवर्तन - मानसिक विकास स्टेप by स्टेप होता है किसी बालक में बौद्धिक योग्यता का विकास स्टेप बाय स्टेप रूप से बढ़ती हुई आयु के साथ होता है यही बात अन्य मानसिक योग्यताओं के विकास में देखी जा सकती है
4. योग्यताओं का स्वरूप - मानसिक विकास के क्रम में योग्यता का स्वरूप सरल से जटिल की ओर बढ़ता है शिक्षण योग्यता, स्मरण योग्यता, बौद्धिक योग्यता आदि योग्यता का स्वरूप है
2.विशिष्ट विशेषताएं -
इनको निम्नलिखित अवस्था में बांटा गया है
1. बचपन
2. बाल्यवस्था
3. किशोरावस्था
संज्ञानात्मक विकास : समस्या एवं चुनौतियां
संज्ञानात्मक विकास का तात्पर्य योग्यता के विकास से हैं संख्यात्मक योग्यता का अर्थ बुद्धि, चिंतन, कल्पना adhi
se संबंधित योग्यताएं हैं रेबर के अनुसार इसका अर्थ ऐसा मानसिक व्यवहार से है जिन का स्वरुप अमूर्त(abstract)
होता है और जिनमें जटिल नियम उपभोग, विश्वास, अभिप्राय, समस्या समाधान तथा अन्य शामिल होते हैं जे.एस.ब्रूनर(j.s,
bruner) के योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है लेकिन हम यहां केवल पियाजे के योगदान का अध्ययन करेंगे
संज्ञानात्मक विकास के संबंध में जीन पियाजे का योगदान सबसे ऊपर है वह एक मनोवैज्ञानिक थे जिनका जन्म 1896
तथा मृत्यु 1980
में हुई पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया
1.अनुकूलन -
उनके अनुसार अनुकूलन की प्रवृत्ति बालक में जन्मजात होती है अनुकूल का अर्थ है वातावरण के साथ तालमेल स्थापित करना यह 2 तरीके से संभव होता है, जिन्हें समायोजन या समझौता कहते हैं जब कोई बालक किसी परिस्थिति या नहीं परिस्थिति में होता है तो वह पूर्व स्थापित प्रति रुख के आधार पर व्यवहार करता है यदि उनका यह व्यवहार प्रतिरूप सफल होता है तो वे इन में कोई परिवर्तन नहीं लाता है इन्हीं जीन पियाजे ने आत्मा शक्ति करण की परिभाषा दी है
2. संरक्षण - पियाजे के अनुसार संरक्षण का अर्थ वातावरण में परिवर्तन तथा स्थिरता को समझने और वस्तु के रंग रूप में परिवर्तन तथा उसके तत्वों के परिवर्तन में अंतर करने की प्रक्रिया है दूसरे शब्दों में जैन के द्वारा बालक में एक और वातावरण के परिवर्तन तथा स्त्रता में अंतर करने की क्षमता और दूसरी ओर वस्तु के रंग रूप में परिवर्तन तथा उनके तत्वों में परिवर्तन के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित होती हैं
3. संज्ञानात्मक संरचना - भिन्न-भिन्न आयु के बालकों की संज्ञानात्मक संरचना भिन्न-भिन्न हुआ करती है बढ़ती हुई आयु के साथ यह संगठनात्मक संरचना सरल से जटिल बनती जाती है
4. मानसिक संक्रिया(Operation) -
जब बालक किसी समस्या का समाधान करना शुरू करता है तो उसकी मानसिक संरचना संक्रिया बन जाती है इसे ही मानसिक संख्या या मानसिक परिचालन कहते हैं
5.स्कीमा -
इसका अर्थ ऐसी मानसिक संरचना है जिसका सम्मानीयकरण संभव हो संज्ञानात्मक संरचना तथा मानसिक परिचालन से गहरे रूप से संबंध है
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