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बालक : “स्व” निर्मिति के विविध उपागम || Unit 3 c-2nd


Unit 3 c-2nd
बालक :  “स्वनिर्मिति के विविध उपागम

1.  एरिक्सन का स्व निर्माण उपागम
 जीवन परिचय -  एरिक्सन ने फ्रयड द्वारा अहम के निर्माण की प्रतिपादित 5 अवस्थाओं में तीन और अवस्थाओं को जोड़कर व्यक्ति के विकास का विस्तृत और पूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया है इस तरह एरिक्सन ने विकास के आठ सिद्धांत का प्रतिपादन किया एरिक्सन का जन्म 1902 में जर्मन में हुआ एरिक्सन की सबसे महत्वपूर्ण कृतिबाल्यावस्था एवं समाजहै इस किताब में उन्होंने जीवन के 8 अवस्थाओं के बारे में लिखा है

1.   विश्वास बनाम अविश्वास -  प्रथम द्वंद( दो वस्तुओं का जोड़, लड़ाई झगड़ा) बच्चा अपने जीवन काल के प्रथम वर्ष में महसूस करता है बच्चा विश्वास या अविश्वास की एक मनोवृति( मन की स्थिति) विकसित करता है यह माता-पिता या जो बच्चों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं वे निर्धारित करते हैं कि बच्चा विश्वास या अविश्वास में से किस अभिवृत्ति का विकास करे यदि वह सहयोग पूर्ण, खुशहाल, व्यवहार बच्चे से करते हैं, तो बच्चे में विश्वास का भाव विकसित होता है यदि ऐसी अभिवृत्ति( मन स्थिति) बच्चों के आसपास नहीं होती है तो उसमें अविश्वास की भावना विकसित होती जाती है

2. स्वायत्तता बनाम संदेह  -(उस शक्ति को कहते हैं जिसमें किसी को अपना स्वयं पर फैसला लेने का अधिकार मिलता है) बच्चों में विश्वास की भावना उत्पन्न होने के बाद उसके स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के विकास के बने रहने के लिए स्वायत्तता(Autonomy) का विकास आवश्यक है यह दूसरे मानसिक सामाजिक  द्वंद  की शुरुआत है जैसे ही बच्चा आप और मूत्राशय नियंत्रित विकसित कर लेता है तो उसमें स्वतंत्र और आत्म निर्भरता की अभिवृत्ति भी विकसित होने लगती है यदि बच्चे का स्वतंत्र प्रयास गलत साबित होता है तब स्वयं और स्वसंदेह की अभिवृद्धि विकसित होने लगती है जब हम बच्चे को किसी कार्य को स्वतंत्र रूप से स्वयं करने और उसमें sucess हासिल करना सिखाते हैं तब वह स्वयं में स्वायत्तता के भाव का विकास शुरू करता है

3.उपक्रम(आरंभ)बनाम ग्लानि (faintness) (मानसिक शिथिलता) - 5 साल की उम्र के बाद बच्चा अपने कार्य को स्वयं करना शुरू कर देता है यदि बच्चा किसी कार्य को करने की स्वयं शुरुआत करता है और वह कार्य परिवार तथा समाज के नियम के विरुद्ध हो तब भी उस समस्या का समाधान इस प्रकार करना चाहिए कि बच्चों स्वयं को दोषी महसूस ना करें हमेशा ही बच्चे टेलीफोन या रिकॉर्डर के साथ खेलते हैं या वह अपने खिलौने तोड़ देते हैं जिसके लिए उन्हें कठोर सजा मिलती है एरिकसन का मानना है कि सजा बहुत ही हल्की और कम चोट पहुंचाने वाली होनी चाहिए  

4.उधम(शरारत) बनाम हीनता(तुच्छता) - विद्यालय जाने की प्रक्रिया की शुरुआत इस चरण में महत्वपूर्ण रूप से शुरू होती है अब बच्चा पढ़ना सीख कर,question हल कर,ऑल अन्य विशिष्ट दक्षता हासिल कर प्रशंसा जीतने या पाने के द्वंद का सामना करता है बच्चा तकनीक विकसित नहीं कर पाता तब उसमें हीनता का भाव विकसित हो जाता है एरिकसन के अनुसार बच्चों को वस्तुओं के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और जिस कार्य में वह आगे हैं उसे पूर्ण करना चाहिए  इस में शिक्षक की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई है

5. पहचान बनाम भूमिका विभ्रम(शक) - यह चरण किशोर व्यवस्था के दौरान की स्थिति है एडिक्शन का मानना है कि किशोर जिसमें अपने परिवार और स्वयं के प्रति विश्वास का भाव है वह इस द्वंद् को सबसे अच्छे तरीके से सुलझा सकता है और यह द्वंद है पहचान या भूमिका विभ्रम का इस चरण में किशोर के लिए मैं कौन हूं question सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है किशोरों को वह कौन है के भाव को मजबूती से स्थापित करने के लिए, विचारों, आदर्शों तथा पहचान की अपनी दुनिया की खोज करनी होती है जब किशोर को इस बात का पता चल जाता है कि वह अपनी पहचान के अनुकूल व्यवहार रखने में सक्षम नहीं है तो यह अवस्था पहचान विभ्रम की होती है

6. आत्मीयता (अपनापन)बनाम अलगाव(दूरी) - प्रारंभिक व्यवस्था में, स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास के लिए दोस्त, सहयोगी पति या पत्नी के साथ घनिष्ठ संबंध का निर्माण जरूरी है और वह परिवार और समाज से दूरी बनाने लगता है

7. उत्पादकता बनाम गतिरोध (कार्य में बाधा उत्पन्न होना )- व्यक्ति के प्रेम और हिट चिंता का प्रसार केवल अपने नजदीकी व्यक्ति, परिजन या समुदाय तक सीमित ना होकर समाज तथा आने वाली पीढ़ी तक होता है एरीक्शन इसके लिए समर्पित माता-पिता की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं पालन पोषण, मार्गदर्शन, स्नेहा और दिशा किसी व्यक्ति को   स्वार्थहीन आधार पर, प्रदान कर उसे उत्पादकता के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है

8. समग्रता(Totality)  बनाम निराशा - यह व्यवस्था वृद्धावस्था में उत्पन्न होती है आरंभिक मानसिक सामाजिक द्वंद पर सफलतापूर्वक विजय पाने वाला व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन को उपलब्धियों और संतोष से परिपूर्ण पाता है जबकि असफल जीवन जीने वाला, स्वयं तक सीमित रहने वाला और अवसरों को खोने वाला व्यक्ति दुख या निराशा का भाव महसूस करता है

3.महर्षि अरविंदस्वनिर्मिति उपागम महर्षि अरविंद बीसवीं शताब्दी के एक प्रमुख एवं मौलिक विचारक रहे हैं उनका व्यक्तित्व पश्चिमी एवं भारतीय दोनों प्रभावों से रहा है श्री अरविंद परमसत्ता(ulimate reality)को सच्चीदानंद की संज्ञा देते हैं  यह सच्चिदानंद या  ब्रह्म 3 सिद्धांतों से मिलकर सच्चिदानंद के दो प्रारूप हैं अपने प्रथम रूप में वह सत् है श्री अरविंद ब्रह्म के एक दूसरे आयाम को भी स्पष्ट करते हैं इस आयाम कोअतिमानसके नाम से जाना जाता है इसके अनुसार यह अतिमानस(supermind) ब्रह्म का दूसरा प्रारूप है
ब्रह्मअपने तीन रूपों में अभिव्यक्त है -  आत्मा, पुरुष और ईश्वर |  ईश्वर के रूप में ब्रह्म मैं विद्यमान सत उद्घाटित होता है दूसरा पहलू चित का है जिसे चित् शक्ति के रूप में समझा गया है चित शक्ति के भी तीन स्वरूप हैं -  माया, प्रकृति और शक्ति  इन्हें ब्रह्म के तीन रूपों में आत्मा माया, पुरुष प्रकृति, तथा ईश्वर शक्ति समझा जाता है  सच्चिदानंद का एक तीसरा पक्ष आनंद है आनंद किसी भी शब्द का मूल सिद्धांत है इस प्रकार यह स्पष्ट है किसच्चिदानंदपूर्ण सत्ता है श्री अरविंद के शैक्षिक विचार वास्तव में उनके जीवन तथा अध्यात्मिक(आत्मा से संबंध रखने वाला) दर्शन की देन है उन्होंने मानव समाज को आध्यात्मिक विकास का मार्ग दिखाया मानव विकास से उनका अभिप्राय मानव कल्याण की भावना से है
उनका विचार था कि मानव में केवल शारीरिक आत्मा होती है, बल्कि बौद्धिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक अस्तित्व भी होता है व्यक्ति के स्व के विकास से उनका अभिप्राय व्यक्ति के मन और आत्मा की शक्तियों के विकास से है स्वतंत्र एवं स्वच्छ नंद वातावरण मैं ही इस प्रकार का स्व विकसित हो सकता है

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